आसिम मुनीर

मुनीर के सीडीएफ बनाने को लेकर पाकिस्तानी सेना में घमासान, गुस्से में विदेश चले गए शहबाज

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इस्लामाबाद। पाकिस्तान इन दिनों अपने इतिहास के सबसे गंभीर संवैधानिक और संस्थागत संकट से जूझ रहा है। मौजूदा सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का तीन साल का मूल कार्यकाल 29 नवंबर 2025 को समाप्त हो चुका है, लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अब तक उन्हें देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएफ) के रूप में नियुक्त करने वाली अधिसूचना पर हस्ताक्षर नहीं कर रहे हैं। इसके लिए वे जानबूझकर विदेश में डेरा डाले हुए हैं।

मुनीर को CDF बनाने पर सेना में खींचतान तेज, शहबाज शरीफ विदेश जाकर दबाव से बच रहे — पाकिस्तान गहरे संवैधानिक संकट में

इस्लामाबाद। पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर संवैधानिक, राजनीतिक और सैन्य तनाव से गुजर रहा है। सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का तीन साल का निर्धारित कार्यकाल 29 नवंबर 2025 को समाप्त हो चुका है। आम तौर पर इस स्थिति में सरकार या तो नए सेना प्रमुख की नियुक्ति करती है या मौजूदा चीफ का कार्यकाल औपचारिक रूप से बढ़ा देती है। लेकिन इस बार मामला कहीं अधिक उलझा हुआ है, क्योंकि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अब तक वह अधिसूचना जारी नहीं की है, जिसके तहत जनरल मुनीर को देश का पहला चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDF) बनाया जा सके।

सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री इस विवादास्पद नियुक्ति पर हस्ताक्षर करने से बच रहे हैं। स्थिति यह है कि वे पिछले कई दिनों से विदेश यात्रा पर हैं और माना जा रहा है कि यह यात्रा “आवश्यक कूटनीतिक दौरा” कम और “आंतरिक दबाव से बचने की रणनीति” ज्यादा है। उनकी अनुपस्थिति ने सरकार और सेना के बीच के मतभेदों को खुलकर सामने ला दिया है।

सेना की ओर से दबाव, सरकार की ओर से टालमटोल

रिपोर्टों के अनुसार, सेना मुख्यालय चाहता है कि मुनीर को बिना देरी CDF के पद पर नियुक्त किया जाए, ताकि सैन्य संरचना में प्रस्तावित सुधारों को लागू किया जा सके। इसके तहत तीनों सेनाओं (थल, वायु और नौसेना) को एकीकृत सैन्य कमान के तहत लाने की तैयारी है। जनरल मुनीर खुद इस पद के पहले दावेदार माने जा रहे हैं।

लेकिन शहबाज शरीफ की कैबिनेट में इस प्रस्ताव को लेकर भारी मतभेद हैं। कई मंत्री इसे “जनरल मुनीर को सुपर-सीओएएस” बनाने की कोशिश बताते हैं, जिससे सेना के भीतर शक्ति का असंतुलन पैदा हो सकता है। कुछ मंत्री यह भी मानते हैं कि इस कदम से सरकार की पहले से कमजोर नागरिक सत्ता और अधिक सीमित हो जाएगी।

शहबाज की नाराजगी या राजनीतिक गणित?

पाकिस्तानी राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो प्रधानमंत्री शहबाज का विदेश में रहना कोई संयोग नहीं है। वे एक ओर सेना को खुलकर नाराज नहीं करना चाहते, और दूसरी ओर वे फैसला टालकर राजनीतिक समय खरीदना चाहते हैं। ऐसा भी कहा जा रहा है कि वे नेतृत्व को लेकर PML-N पार्टी के भीतर चल रही खींचतान से भी दबाव में हैं, क्योंकि पार्टी का एक धड़ा चाहता है कि नई नियुक्तियों में नवाज़ शरीफ की राय को अहम महत्व दिया जाए।

देश में अनिश्चितता और संवैधानिक सवाल

जनरल मुनीर का मूल कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद स्थिति संवैधानिक रूप से और अधिक पेचीदा हो गई है। बिना औपचारिक विस्तार या नई नियुक्ति के, सेना प्रमुख का “कार्यकालोत्तर” काल संवैधानिक बहस को जन्म दे रहा है। विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाते हुए सरकार पर “अदम्य निर्णयहीनता” का आरोप लगाया है।

वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान के इस संकट को अस्थिरता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। अर्थव्यवस्था पहले ही भारी दबाव में है और राजनीतिक-सैन्य टकराव से निवेशकों और सहयोगी देशों में चिंताएं और बढ़ गई हैं।

अगले कुछ दिन बेहद निर्णायक

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की वापसी के बाद स्थिति किस दिशा में जाएगी, यह देखने वाली बात होगी। क्या वे सेना की मांग मानकर मुनीर को CDF नियुक्त करते हैं, या फिर नया सेना प्रमुख नियुक्त कर नई शक्ति-संतुलन व्यवस्था स्थापित करते हैं—दोनों विकल्प पाकिस्तान की राजनीति और सेना संबंधों पर दूरगामी प्रभाव छोड़ेंगे।

एक बात साफ है कि यह मामला अब सिर्फ एक नियुक्ति का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि पाकिस्तान की सत्ता संरचना की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ बन चुका है।

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